लघुकथा
// निःशब्द // "बिटिया रानी....! मैं सोच रहा हूँ कि तुम पढ़ाई करती रहो और साहित्य सेवा भी; जिससे हमारी साहित्यसेवा बढ़ती रहे। साहित्य सृजन के जरिये हमारी समाज सेवा भी होगी। मुझे तो अभी और आगे बहुत कुछ करना है। तुम क्या सोचती हो इस बारे में ? क्या तुम सहमत हो मेरे इस बात से ?" एक साहित्यकार पिता इंद्रजीत ने रूही के पास अपनी स्नेहपूर्वक बात रखी। थोड़ी देर सोचने के बाद रूही बोली- हाँ... हाँ...! पापा क्यों नहीं... ? मुझे आपके साथ अधिक से अधिक समय बिताने को भी मिलेगा; और एक साथ कार्य करने में अच्छा भी लगेगा। रोज अखबारों के पन्नों में बड़े-बड़े अक्षरों में आपके नाम के साथ मेरा भी नाम आएगा।"रूही की बातें सुन इंद्रजीत जी हँस पड़े। रूही मुँह बनाते हुए बोली- "पापा ! इसमें हँसने वाली क्या बात है ? हम ऐसा कार्य करेंगे तो हम दोनों का एक साथ नाम नहीं आएगा क्या ?" ...