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लघुकथा

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               //जिंदगी के साथ भी, जिंदगी के बाद भी// ये क्या पोथी पुराण ले कर बैठे रहते हो जी। जब देखो पोस्ट करना फिर थोड़ी देर बाद  फेसबुक में लाइक कमेंट्स देखना। क्या मिलता है समझ नहीं आता? आज अनुराधा सुबह–सुबह अपने पति मनोरम से तीखी आवाज़ में बोली।  मनोरम ने पूछा– तुम्हें क्या हो गया है अनु? आज पारा सूरज की तरह गर्म क्यों लग रहा है?  तभी अनुराधा बोली– हमारे कॉलोनी के सभी लोग बोलते हैं मुझे;  तुम्हारे पतिदेव दिन भर पोस्ट करते रहते हैं और मोबाइल में घुसे रहते हैं।  न जाने मेरे पीठ पीछे कितना रायता फैला रहे होंगे; पता चले तो समेटना मुश्किल हो जाएगा। अच्छा! तो तुम ये क्यों नहीं बोलती कि वे एक साहित्यकार हैं, कविता–कहानियाँ लिखते हैं। मनोरम अनुराधा को बड़े ही सहजता से बोला। अच्छा! अपने आप को बहुत बड़े साहित्यकार मानते हैं;  ये भी कोई शौक़ है भला!  मुँह बनाती हुई अनुराधा बोली।             बिल्कुल! क्यों नहीं। विश्व में ऐसी कोई भी जगह नहीं छूटी है जहाँ मेरी कविताएँ न छपी हो; समझी!  म...