माँ का दर्द
(बाल कहानी) //माँ का दर्द// माँ मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। वाह! मैदान भी हरा–भरा है। चीनू उछलते हुए अपनी माँ से कहने लगा; हम रोज आ कर खेलेंगे न.....! हाँ बेटा चीनू; माँ ने हँसते हुए हामी भरी। खुले मैदान में चीनू जैसे और भी छोटे – छोटे बच्चे खेल रहे थे यह देख चीनू और भी खुश हो गया। चीनू की दोस्ती उन नन्हें –नन्हें बच्चों से हो गई। प्रतिदिन आते और मजे करते। इसी बहाने सबसे मिलना–जुलना भी हो जाता था। नील गगन के नजारे, ठंडी–ठंडी हवाएं, स्वच्छ वातावरण हृदय को छू लेती थी। वहीं; सामने के बालकनी से नन्हीं प्रीत (बच्ची) भी इन्हें खेलते देखती और आनंद लेती; साथ ही साथ सोचती मैं भी इनके साथ खेलने जाती लेकिन...... दूर से देख कर ही मुस्कुराती। आज शाम चीनू खेलते–खेलते थोड़ी दूर मैदान के दूसरे छोर पर चला गया। माँ अपनी सहेलियों से बात करने में व्यस्त क्या हो गई.....जैसे ही चीनू की माँ की नज़...