Posts

Showing posts from January, 2025

महतारी भाखा

Image
  कहानी :                      // महतारी भाखा //         "कोन गाँव जावत हस काकी? ए दुलारी काकी...! तैं मोला नइ चिन्हत हस का ओ...?" आशा ह बस म बइठे गाँव के एक झिन माई लोगिन ल हुद करइस।                "अई... तोर अवाज ह तो आशा सरिक लागत हे ओ नोनी।"  दुलारी हर आशा डहर मुँहू करिस।        "हव...हव... आशा हरँव ओ।" "कइसे मुँहू–कान ल चमचम ले बाँध ले हस दई? आँखी भर जुगुर–जुगुर चिमनी कस बरत हे।" दुलारी ह गोठियात-गोठियात हाँस डारिस।       "का करबे काकी, अब्बड़ धुर्रा–फुदकी के मारे मुँहू–कान हर कइसे हो जाथे। तहूॅं बाँध ले कर न काकी।" आशा बने समझाए अस बोलिस। तभेच "अइ देखत हस येला। नानपन म धुर्रा म घोलँड–घोलँड के खेले हे तेला, भुलागे बाई जी ह।" तीर म बइठे दूसर माई लोगिन ल अँखियात दुलारी ह बोलिस।     ...

बसंत आगमन

Image
  //बसंत आगमन//       या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।       नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। देवी आराधना सांसारिक जीवन की नितांत आवश्यकता है। देवी, शक्ति व भक्ति का जीवंत स्वरूप है, जो मानवकल्याण के लिए अन्य संसाधनों से सर्वोपरि है। अतः संसार में देवी की पूजा –अर्चना,जीवन के सुख प्राप्ति व दुख निवारण के लिए आवश्यक माना गया है। हिंदी पंचांग के अनुसार हर माह किसी न किसी देव अथवा देवी के पूजन की तिथि निहित होती है, इन्हीं में से माघ महीने में बसंत ऋतु के आगमन होते ही बुद्धि, ज्ञान व संगीत की देवी माँ वागेश्वरी की आराधना संसार के समस्त जीव अपनी–अपनी भक्ति अनुसार करते हैं। इससे आध्यात्मिकता पर विश्वास बढ़ता है और वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, सुख–समृद्धि चिरस्थाई बनी रहती है।                    माघ महीने में बसंत पंचमी का दिन देवांगन समाज की कुल देवी माँ परमेश्वरी की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। "ग्राम देवी/देवता" – हर ग्राम में कोई न कोई ग्रामदेवता रहते हैं और हर समाज म...

भुर्री

Image
आलेख : // ग्राम्य लोक-संस्कृति में भुर्री का महत्व // किसी कवि ने क्या खूब कहा है -           "गाँव की माटी को सूँघो,                गंध को एक नाम दे दो।"           एक मुस्कुराती सुबह दे दो,                एक सुहानी शाम दे दो।।"        उक्त चरितार्थ पंक्तियों के सम्बंध में कुछ इस तरह की बातें कही जा सकती हैं कि तीन पहर का दिन और चार पहर की रात का सुहाना संगम छत्तीसगढ़ के ग्राम्य अंचलों में दिखता है। यहाँ के लोग पूरे बारहों महीने पसीनेतर कमाई से कभी नहीं घबराते। तप्त ऋतु की भीषण गर्मी हो, पावस की मूसलाधार बारिश हो, चाहे शीत की कड़कड़ाती ठंड हो, सब एक बराबर होते हैं इनके लिए। गर्मी और बारिश का सामना करते हैं और ठंड से वे तनिक नहीं डरते। हर स्थिति में अपने भीतर उष्णता बनाए रखते हैं; चाहे खानपान, पहनावा या फिर चाहे और कोई बाह्य स्रोत जैसे- चुल्हे की आग, गोरसी की खरखराती धीमी आँच या फिर पैरा या झिटका की दहकती आँच अर्थात भुर्री। भुर्री तापना एक...

फर्स्ट प्राइज

Image
  बाल कहानी :                // फर्स्ट प्राइज़ //           इस बार स्कूल में बहुत मजा आने वाला है। आएगा भी क्यों नहीं; बालमेले का आयोजन जो हो रहा है। यह एक प्रतियोगिता भी है। राहुल और संयम को पिछली बार का आयोजन याद आने लगा। बड़ा मजा आया था उन्हें।            संयम बोला– "हाँ, यार राहुल उस बार हमने मोमोज़ और तीखी चटनी बनाई थी। सर–मैम ने बहुत तारीफ़ की थी। इस बार भी हमारे ग्रुप को ही फर्स्ट प्राइज़ मिलना चाहिए। सो फ्रैंड्स! सभी तैयार हो जाओ। बातें करते–करते सभी बच्चे अपने–अपने घर लौट गये।            दूसरे दिन बच्चे मेले की तैयारी में लग गये। स्कूल कैम्पस सज गया। बच्चों की किलकारियाँ गूँजने लगी। पकवानों की खुशबू फैलने लगी थी। टीचर भी बहुत खुश थे। लेकिन संयम, जो पकवान बना रहा था, उसे देख सभी बच्चे हँसने लगे।            "अरे! संयम ये क्या बना रहा है तू, इसे कौन खाता है भला?" उसके क्लासमेट्स चिढ़ाते हुए बोले। संयम शांत दिमाग से अपने क...

दीपावली

Image
  लेख :   // संस्कृति की डाल का एक पारम्परिक पुष्प - दीपावली //                 छत्तीसगढ़ धान का कटोरा तो कहलाता है; साथ ही, लोकपर्वों का एक गढ़ है। यहाँ के तीज-त्यौहार विभिन्न लोक-परम्परा व संस्कृति को समेटे हुए होते हैं। ग्रामीण रस्म-रिवाज, रहन-सहन एवं वेशभूषा की झलक लोकपर्वों में परिलक्षित होती है; चूँकि हमारे ग्राम्यांचल के समस्त लोकपर्व कृषि पर आधारित ही नहीं वरन् निर्भर भी होते हैं। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में पाँच दिनों तक मनाया जाने वाला प्रकाशपर्व दीपावली इनमें से एक है। पावस ऋतु की विदाई के अवसर पर धान की नई फसल दीवाली के हर्षोल्लास में चार चाँद लगा देती है।      दीपावली के त्यौहार में प्रत्येक व्यक्ति के मन में प्रतीक्षा के साथ–साथ उत्साह की फुलझड़ियाँ प्रस्फुटित होने लगती हैं। इन पाँच दिवसों में अनुपम आनंद की अनुभूति होती है। छत्तीसगढ़ के त्यौहारों में प्रकृति का विशिष्ट योगदान है। इसके बगैर यहाँ त्यौहार मनाने की कल्पना नहीं की जा सकती। समस्त वातावरण को आलोकित करती दीपावली पाँच दिवसों तक मनाई जाती है- धन्वंतर...