महतारी भाखा
कहानी : // महतारी भाखा // "कोन गाँव जावत हस काकी? ए दुलारी काकी...! तैं मोला नइ चिन्हत हस का ओ...?" आशा ह बस म बइठे गाँव के एक झिन माई लोगिन ल हुद करइस। "अई... तोर अवाज ह तो आशा सरिक लागत हे ओ नोनी।" दुलारी हर आशा डहर मुँहू करिस। "हव...हव... आशा हरँव ओ।" "कइसे मुँहू–कान ल चमचम ले बाँध ले हस दई? आँखी भर जुगुर–जुगुर चिमनी कस बरत हे।" दुलारी ह गोठियात-गोठियात हाँस डारिस। "का करबे काकी, अब्बड़ धुर्रा–फुदकी के मारे मुँहू–कान हर कइसे हो जाथे। तहूॅं बाँध ले कर न काकी।" आशा बने समझाए अस बोलिस। तभेच "अइ देखत हस येला। नानपन म धुर्रा म घोलँड–घोलँड के खेले हे तेला, भुलागे बाई जी ह।" तीर म बइठे दूसर माई लोगिन ल अँखियात दुलारी ह बोलिस। ...