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उपेक्षा

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               ‎                //उपेक्षा// ‎ ‎ अरे तुम यहाँ! तुम्हें तो कोई पूछता भी नहीं होगा। हा.....हा....ही.....ही....!! जोरों से व्यंग भरी हँसी, तिरछी मुस्कान...जैसे हृदय में कोई तीर चुभा रहा हो। तुम्हें यहाँ जीने का कोई अधिकार नहीं है। अपनी हालत देखी है कभी तुमने? हमें देखो जब कोई युवती अधिक सुंदर दिखती है तो लोग उसे हमारा दर्जा देते हैं कि गुलाब की तरह दिख रही हो, लोग मुझे अपने जीवन में प्रेमपूर्वक स्थान देते हैं; आज की युवा पीढ़ी मेरे बिना अधूरी है। हाँ, और मैं गेंदा; मुझे भी लोग खूबसूरती का पर्याय समझते हैं। हम तो हरि चरणों तक भी समर्पित हो जाते हैं और तुम्हें तो ईश्वर तक अपने आसपास भटकने नहीं देते। छी..... छी....... कितनी बदबू है तुम्हारे अंदर.....! ‎ ‎ गुलाब और गेंदा अपनी नाक पंखुड़ियों से ढँकने लगे। ‎ ‎भगवान ने प्रकृति में कोई भी चीज अनावश्यक नहीं बनाई है, हर चीज की कीमत वक्त आने पर ही पता लगती है। मेरी भी अस्मिता है, मेरे दामन में दाग लगाने का आपको कोई अधिकार नहीं है। ‎ ‎बेशरम का पौधा पत्तियां...

आसरा

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  ‎                 //आसरा// ‎ ‎सपना देखत–देखत घलो कभू–कभू आँखीं म जाला परे ल लगथे। सपना देखे ले भी ज्यादा जब पूरा होथे त अंतस म उछाह बाढ़ जाथे। लीना अउ ओकर बाबू, दूनों मिल के लीना के बिहाव के सपना देखे रहे। अगास के जावत तक बाप–बेटी के नता ले तो जम्मो मनखे ह परिचित रहिथे; जब बेटी के बिहाव के पारी आथे त अउ का पूछना...! ‎समय के चक्का ह घूमत रीहिस फेर विधाता ल काय मंजूर रीहिस ते उही जानै। शायद बेटी के भाग म अपन बाप के हाथ म कन्यादान नइ लिखाए रीहिस। ‎'समय के चक्का ह तो घूमते रहिथे, ये हर नदिया के पानी जइसे होथे, कतको रोके के उदिम कर ले; समुंदर म समाय बर रद्दा खोज डारथे।' बेरा आइस; बेटी के बिहाव बने सरकारी नौकरी वाला लड़का संग तय होगे। घर वाले मन खुशी–खुशी लेन–देन के तैयारी करे ल लागिस। ‎‌‌ कन्यादान के बात ल ले के खुसुर–फुसुर होवत रहै परिवार म। अब नोनी के कन्यादान ल कोन करही? एक झन रिश्तेदार ह पूछे के हिम्मत जुटा डारिस। जतेक करीबी रिश्तेदार रहिन, एक–एक पाँव पाछू घुॅंचगें। ‎काबर.... आजकल महंगाई के जमाना हे, कन्यादान ल कर देबो त हमन ल हर बछर ती...

मिठास

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  (मकर संक्रांति विशेष) //मिठास// कृति को यू ट्यूब देख ऐसा लग रहा था मानो बाएं हाथ का खेल हो लेकिन....... किसी काम को सोचने और करने में जमीन–आसमान का फर्क तो होता ही है। यू ट्यूब ऑन कर, गैस प्लेटफॉर्म में मोबाइल रख स्क्रीन एक ऊंगली से सरकाई जा रही थी, उसे समझ नहीं आ रहा था आखिर ये तीन तार की चाशनी बनती कैसे है?  उसे लगता था कि यू ट्यूब ही उसे हर कार्य में माहिर बना देगा। इसलिए कभी किसी की मदद नहीं लेती थी। लेकिन......वीडियो देख–देख उसका सिर घूमने लगा।           कहते हैं न "मरता क्या न करता"। आखिरकार कृति को सासू माँ के पास जाना ही पड़ा। कृति सासू माँ के पास गई, बातों से मक्खन लगाती हुई मन की सारी बात बताई; सासू माँ कृति के पैंतरों से भली–भांति परिचित थी। सासू माँ बोली– ठीक है! लेकिन जब तक बनेगी नहीं तुम यहाँ से हिलना नहीं; मेरी मदद करना। कृति के होठों पर मुस्कान आई।                    सासू माॅं झटपट से चाशनी और लड्डू तैयार कर ली। कृति अपनी आँखें बड़ी कर निहारने लगी और बोली- "अरे वाह! माँ जी आपने इत...

आस्था

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  ‎           //आस्था// ‎आज मंदिर में बहुत भीड़ थी। रहेगी ही.... नवरात्रि की पंचमी तिथि जो थी। पाँव रखने की जगह नहीं। जितनी भीड़ मंदिर के भीतर उतनी ही भीड़ मंदिर के बाहर...। फर्क इतना था कि मंदिर के अंदर वाले भक्त कहलाते और बाहर वाले भिखारी। मंदिर के भीतर वाले सीधे भगवान जी से जुड़ने की कोशिश में थे और बाहर वाले इंसानों से। ‎एक बूढ़ी माँ काफी देर से लाइन में लगी हुई थी। पुजारी को बार–बार बोलती रही- "बेटा...मुझे जल्दी दर्शन करवा दो, मैं बूढ़ी औरत कब तक खड़ी रहूँगी।" पुजारी जी भड़क उठे......बोला न! बाद में आना, पूरा अशुद्ध कर दी मंदिर को। यहाँ तुम जैसे लोगों के लिए जगह नहीं है। जा अपनी जगह पर बैठ जा; जो कि सीढ़ियों के नीचे है। नहीं जाऊँगी, जब तक माता जी का दर्शन नहीं करूँगी। बूढ़ी भिखारन अपनी जिद्द पर अड़ी रही। तभी पीछे से शहर का बहुत रईस व्यापारी आया जो कि हर साल लाखों रुपए दान मंदिर में चढ़ाता है। उसे आते देख पुजारी का गुस्सा फ्रिज के ठंडे पानी की तरह एकदम शांत हो गया। होगा भी क्यों नहीं...... हर बार की तरह इस बार भी पुजारी जी की इच्छा थी कि कम से कम ...

गुफ्तगू

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              //गुफ्तगू// आज कल रिश्ता पक्का करना किसी जंग जीतने से कम नहीं है। लड़के वालों की फरमाइशें सुन कर ही डर लगता है भाई साहब!... विपुल और राहुल मार्निंग वॉक करते आज विवाह के रिश्ते पर चर्चा कर रहे थे।  जी भाई साहब, बिल्कुल! राहुल ने कहा।            अच्छा......! जमाना तो देखिए, आजकल बड़े लोग अपने खेतों में झाँकने तक नहीं जाते और लड़की वालों को खेत–जमीन, जायजाद के बारे में ऐसे सवाल करते हैं जैसे शादी के बाद उनका लड़का खेतों में हल चलाएगा। वाह..! जोर से ठहाके लगाकर विपुल जी हँसने लगे। अरे.....भाई साहब! इसमें हँसने वाली बात नहीं; राहुल जी वहीं किनारे रुक आँखें बड़ी कर अचरज भाव से बोले- "हमारे घर जो भी रिश्ते आते हैं सब वही पूछते हैं। लड़की इकलौती है तो कुछ तो मिलेगा न हिस्से में, वाह.....भई...... वाह....! ऐसा लगता है मानो लड़की से शादी नहीं; उनकी जमीन और खेती का सौदा करने आया हो।"  सांस लेने तक को पौधे नहीं बच रहे, धनिया क्या लगाएंगे... खेतों की बात करते हैं; मुँह बनाते राहुल जी बोले। "पहले बुजुर्ग, लड़की ...

अतलंग के सजा

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          //अतलंग के सजा// कइसे वो कहाँ जाए के तैयारी करत हस; मोटरा मन ल गठियात हस।  चिटरू मुसवा ह अपन बाई टीनी मुसवी ले पूछिस। टीनी अपन माथा धर के तेज आवाज म बोलिस– "अरे...राम राम! कइसे बात करत हव जी आप मन; नइ जानव का गणेश पक्ष आवत हे? अब ग्यारह दिन तक उहें उसर–पुसर के रहना बसना, खाना हे, प्रभु के सेवा म गाना–बजाना हे। अब तो हमरे राज चलही।" पुछी ल हलावत टीनी बोलिस। अच्छा.....ठीक.... ठीक मैं भुला गे रहेंव बाई! सोचत रहेंव की काहीं भुलाए–भुलाए कस लागत हे। फेर का ह ते सुरता नइ आवत रीहिस। टीनी एक हाथ ल कनिहा म रखत बोलिस– "तोर तो चेत नइ रहय जी आजकल; जइसे–जइसे उमर बाढ़त जात हे, दिमाग घलो कमती होत जात हे तइसे लागत हे।" अँखियात टोंट मारत टीनी ह बोलिस।  ये बाई! सुन न मैं तोला कुछ नइ बोलव ओखर मतलब मोर बेज्जती करबे का? अंगरी देखावत चिटरू बोलिस। लगभग आधा घंटा तक मुसवा–मुसवी के लड़ाई चलिस। चलो रे..... लइकामन सबोझन झोला म अपन–अपन कपड़ा लत्ता ल धरौ। आधा दर्जन तो लइका रहय चिटरू के। एक झन लइका पूछिस– "दाई....ये दाई…….हमन कोन गाँव जावत हन वो?" ऐदे बेटा; थोरिक दुरि...

सोना समझ गई

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बालकहानी :              //सोना समझ गयी //           "मैं बहुत थक गयी हूँ। अब एक कदम भी नहीं चला जाता है मुझसे। सुबह से शाम तक बस; सिर्फ काम ही काम। सुनिए जी, आज मैं घर पर ही रहूँगी। आप जाइये काम पर।" नन्हीं चींटी सोना ने अपने पति डंबू से कहा।            डंबू ने सोना को चिढ़ाते हुए कहा - "ओह ! तो आज मेरी सोना थक गई है। आराम फरमाएगी। अच्छा...!"           डंबू की बात से सोना तमतमा गयी। कहने लगी- "मैं आपसे ज्यादा वजनदार सामान उठाती हूँ, लेकिन आज थोड़ी थकान महसूस हो रही।" डंबू ने कहा- "ठीक है, आज तुम आराम कर लो। कल साथ में चलेंगे।" सोना ने मुस्कुराते हुए कहा- "लो आप जाइए।" डंबू काम पर चला गया।           दिन भर डंबू काम करता रहा। शाम को घर वापस आया। खाने का कुछ सामान ले आया था। घर के अंदर रखा। सोना से कहा - "सोना ! तुम्हारी तबीयत कैसी है ?"            सोना सेब के टुकड़े को चबाते हुए मजे से बोली- "मैं बिल्कुल अच्छी हूँ। भली च...