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होली विशेषांक

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  //होली विशेषांक// बाल कहानी :              // होली की सतरंगी छटा //           श्वेता को पिछले साल की होली याद थी। कभी नहीं भूल सकती उस होली-हुड़दंग को। होली के जस्ट दूसरे दिन बीमार जो पड़ गयी थी। मम्मी-पापा बहुत परेशान हुए थे। हॉस्पिटलाइज़्ड् होना पड़ा था उसे एक हफ्ते के लिए; स्कूल अब्सेंट सो अलग। सो इस बार उसने ठान लिया था कि वह अपनी सहेलियों के साथ रंग-गुलाल खेलने बाहर नहीं जाएगी। तभी हिमांशी, नीलिमा व गीतांजलि को अपने घर की ओर आते देख फट से दरवाजा बंद कर लिया। एक कमरे में चुपचाप बैठ गयी।  श्वेता के घर पहुँचते ही नीलिमा ने उसकी मम्मी से पूछा- "आंटी जी, श्वेता कहाँ है ? मम्मी मुस्कुराती हुई बोली- "अभी ही तो वह बाहर खड़ी थी। तुम सबको आते हुए देखकर अंदर चली गयी। उसे लगाओ न आवाज।"            "श्वेता ! अरी श्वेता बाहर आओ न। होली खेलेंगे बहन। काहे को दरवाजा बंद की हो ?" हिमांशी ने दरवाजे को हिलाते हुए आवाज लगाई।           "नहीं.... नहीं....। न बाबा...न...। मुझे नह...