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Showing posts from October, 2023

विचार

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                        विचार :     // दैवीय जीवंत प्रतिमा का रूप - माँ //           नवरात्री लगते ही भक्तगण माँ अम्बे, भवानी , दुर्गा जैसे विभिन्न रूपों की प्रतिमा का अलग–अलग दिन विधि–विधानपूर्वक पूजा-अर्चना करते हैं। सामर्थ्य अनुसार माँ को श्रृंगार सामग्री, मिठाई व फल-फूल चढ़ाते हैं। पर उस प्रतिमा का क्या ? जो आज अपने ही घर में बेबस और लाचार पड़ी है। मेरा मतलब, अपनी ही जननी से; जिसने हमें जाया है। यह सच है, आज भी कई माएँ वृद्धाश्रम में हैं, जो अपने बहू-बेटे व पोते-पोती की राह ताक रही हैं; और इस आस में बैठी हुई हैं कि उनके बेटे उन्हें लेने जरूर आयेंगे। नवरात्री में लोग जितनी सेवा व पूजा माँ की प्रतिमा का करते हैं, अगर उनकी आधी सेवा भी अपनी माँ के लिये करते , तो आज हर घर एक मंदिर बन जाता।           माँ अम्बे की प्रतिमा में माँ अम्बे विराजती है, लेकिन एक साक्षात प्रतिमा, जिसे दुनिया माँ के नाम से जानती है; में पूरा ब्रम्हाण्ड विराजमान होता है। सिर्फ मंदिर जाकर दान-दक्षि...

पितर विशेष

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              //पितर विशेष //           // हमर पितर अउ हमर कउँवा //             पितर पाख ह कुँवार महीना के अंधियारी पाख के एक्कम तिथि ले लेके अमावस तक चलथे। पंदरा दिन तक घरोघर बरा, सोहारी, गुलगुला भजिया, खीर बनाके पुरखा मन ला गुड़ अउ घींव के हुम दे जाथे।  बताए हे की गुड़ अउ घी के हुम ला पितर पाथे। पितर पाख मा तो अबड़ नियम–धियम रहिथे, फेर आज कल के वातावरण अउ व्यस्थता ला चलते धीरे–धीरे बदलत जात हे; अउ कम होवत हे। पर पितर ह सिरिफ बरा, सोहारी राँध–राँध के खाय बर नइ मनाये जाए; भलुक येमा मनखे के संग–संग हमर पर्यावरण अउ पशु–पक्षी घलो जुड़े रहिथे। आजकल मनखे मन हा सोचथे की पितर ल नइ मनाबो त का हो जाही। नहीं.... नहीं.....। येकर नइ मनई हर हमर पर्यावरण अउ पशु–पक्षी के विनाश के कारण घलो बन सकत हे।           हमर सियान मन बोलय की हुम देये के बाद रोटी–पीठा ल छानही म फेंक देहू। कउँवा मन आहीं अउ खाहीं त समझ लेहू की पितर मन आ के खावत हें, त घर म जेन नान–नान लोग–लइका रहय तेन मन हर बबा–द...