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अतलंग के सजा

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          //अतलंग के सजा// कइसे वो कहाँ जाए के तैयारी करत हस; मोटरा मन ल गठियात हस।  चिटरू मुसवा ह अपन बाई टीनी मुसवी ले पूछिस। टीनी अपन माथा धर के तेज आवाज म बोलिस– "अरे...राम राम! कइसे बात करत हव जी आप मन; नइ जानव का गणेश पक्ष आवत हे? अब ग्यारह दिन तक उहें उसर–पुसर के रहना बसना, खाना हे, प्रभु के सेवा म गाना–बजाना हे। अब तो हमरे राज चलही।" पुछी ल हलावत टीनी बोलिस। अच्छा.....ठीक.... ठीक मैं भुला गे रहेंव बाई! सोचत रहेंव की काहीं भुलाए–भुलाए कस लागत हे। फेर का ह ते सुरता नइ आवत रीहिस। टीनी एक हाथ ल कनिहा म रखत बोलिस– "तोर तो चेत नइ रहय जी आजकल; जइसे–जइसे उमर बाढ़त जात हे, दिमाग घलो कमती होत जात हे तइसे लागत हे।" अँखियात टोंट मारत टीनी ह बोलिस।  ये बाई! सुन न मैं तोला कुछ नइ बोलव ओखर मतलब मोर बेज्जती करबे का? अंगरी देखावत चिटरू बोलिस। लगभग आधा घंटा तक मुसवा–मुसवी के लड़ाई चलिस। चलो रे..... लइकामन सबोझन झोला म अपन–अपन कपड़ा लत्ता ल धरौ। आधा दर्जन तो लइका रहय चिटरू के। एक झन लइका पूछिस– "दाई....ये दाई…….हमन कोन गाँव जावत हन वो?" ऐदे बेटा; थोरिक दुरि...