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पुचकी अउ पुचकू

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  छत्तीसगढ़ी बालकहानी :               // पुचकी अउ पुचकू //           "सुन न पुचकू!" पुचकी ह पूछते रिहिस हे तइसने मा; पुचकू कहिथे- "काय होगे पुचकी? गोठिया न। अतेक संसो म कइसे दिखत हस आज तैं?" दूनों परानी एक-दूसर ल अबड़ मया करैं। एक-दूसर ल पुचकी-पुचकू कहत हूँद कराँय; अउ गोठियाँय। इँखर पति-पत्नी म मया ल आन चिरई मन बड़ सँहराय।         पुचकी कहन लागिस- "मोला बड़ फिकर होवत हे जी। येदे अब मोरो अंडा दे के दिन लकठावत हे। अब हमन कहाँ जाबो, खोंदरा कहाँ बनाबो, कुछ समझ नइ आवत हे। ये मनखे मन ह अपन स्वारथ के हरे। रुख–राई ल काट डरे हे। नदिया ला पाट डरे हे अउ अपन मन बड़े–बड़े महल–अटारी ल छाबत हें। हमन मरन चाहे बाँचन का फरक पड़थे कोनो ला। "            "तोर बात तो सोला आना सच हे पुचकी, फेर का होही ते, एसो के गरमी घलो बड़ लाहो लेवत हे। सुरुज देवता सउँहत आगी उगलत हे। मनखे मन खड़े–खड़े भुँजावत हें ता फेर हमन कोन खेत के ढेला हरन।" गोठियाते-गोठियात पुचकू थोरिक चुप होइस।       ...