Posts

Showing posts from April, 2024

व्यंग्य

Image
  व्यंग्य :         // सोंचथँव कि का होही साहित्य के //           "राम–राम गा संगवारी। कइसे मालिक अतेक का लिखाय हे आज के गजट मा ? मुँह ले बक्का घलो नइ फूटत हे।" रामभरोस हा चौरा मा बइठे घनश्याम ले पूछीस।           "राम–राम गा भैया राम राम। हमर छत्तीसगढ़ के हाल ला पढ़त हँव ता मोला रोवासी घलो आवत हे।" एक पन्ना अउ पलटिस।           "का होगे संगवारी, का लिखाय हे तेमा तोला रोवासी आवत हे ?" रामभरोस हा घनश्याम ल पूछत चौरा मा बइठ गे।  ‌ "ता सुन। घनश्याम ह बोलिस- "आज कल हमर छत्तीसगढ़ के हर गली-मोहल्ला मा कवि मन के भरमार होगे हे गा।"           "हव सही कहे जी संगवारी।" रामभरोस हा हुकारू देवत रिहिस- "दू–चार लाइन ला लिख देथे अउ तुक्का मिला देथे ता जगह –जगह गोहार पारत फिरथे, मैं कवि आव...मैं कवि आव.... कहिके। अपन नाँव के आगू मा कवि लिखना चालू कर देथे। बपुरा मन ला न कोनो व्याकरण के ज्ञान रहय, न कोनो मात्रा के। व्याकरण तो व्याकरण मात्रा अउ छत्तीसगढ़ी शब्द के हाल ला बिगा...

अधूरी ख्वाहिश

Image
  //लघुकथा// //अधूरी ख्वाहिश// मम्मी....मम्मी..... सुनिए न! क्या हुआ मेरी गुड़िया? प्रातःकाल से इतना शोर क्यों मचा रही हो? मम्मी.....मिन्नी स्वरबद्ध होकर बोली और आ कर पीछे से लिपट गई। अच्छा बताओ क्या बात है? मिन्नी बोली– "मम्मी मेरे दिमाग में बहुत अच्छा आइडिया आया है, आज के लिए।" ओह! ऐसा आज कुछ खास दिन है क्या? मिन्नी अपनी आँखें बड़ी–बड़ी कर हैरान नज़रों से मम्मी को देखने लगी; तभी किचन में पापा जी भी आ गए और दोनों से पूछने लगे- "क्या बात है? मांँ–बेटी में क्या खुसुर–फुसुर हो रही है भई....!" पापा जी थोड़ा मजाकिया अंदाज में बोले। नहीं... नहीं...ऐसी कोई बात नहीं है पापाजी कह कर मिन्नी किचन से चली गई। पापा जी के ऑफिस जाने के बाद मिन्नी बोली– "क्या मम्मी आप भी न..." ऐसा बोलते ही शांत बैठ गई। ओहहो! ठीक है बाबा बताओ , क्या–क्या करना है? मिन्नी ने अपनी मम्मी को पूरी योजना बताई। मम्मी बहुत खुश हुई और बोली एक बिटिया ही तो होती है, अपने पापा के जीवन में हर छोटा–बड़ा सपना को साकार करने में लगी रहती है और बिल्कुल माँ जैसा ख्याल भी रखती है, भाव–विभोर हो मम्मी की आँखें भ...