दोस्ती
दोस्ती
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जब हम स्कूल जाते हैं तो वहाँ बहुत सारे दोस्त बन जाते हैं । वहाँ जाकर हम एक दूसरे के साथ खेलते हैं । मस्ती करते है । पढ़ाई करते है। साथ साथ अपना टिफिन भी मिल बाँट कर खाते। ऐसे ही दोस्तो की एक टोली हमारी भी थी। हम सब 6 सहेलियाँ थी। एक साथ स्कूल जाते । स्कूल में दिन भर सबके साथ समय बिताते थे। जब शनिवार को सुबह स्कूल लगता था और जल्दी छुट्टी हो जाती थी । तो एक दूसरे के घर जा कर खेला करते थे। हमारी दोस्ती को स्कूल के शिक्षक - शिक्षिका देख कर खुश रहते थे। धीरे धीरे बड़े हुये। मेरे पापा शिक्षक थे तो हम सब को दूसरे जगह जाना हुआ। जब मेरे सभी सहेलियों को पता चला की अब मैं यहाँ से जा रही हूँ तो सभी बहुत रोये और कहने लगे कि जब भी यहाँ आएगी तो बिना मिले मत जाना। मेरे को भी अच्छा नइ लग रहा था । वहाँ से जाने का मन न कर रहा था। फिर भी जाना पड़ा। सभी ने अपना अपना मोबाइल नंबर दी। यहाँ आने के बाद एकदम अकेला सा लगने लगा । समझ न आ रहा था कि नये जगह में कोई अच्छे से दोस्त मिलेंगे या नही। पुरानी दोस्तो की बहुत याद आती थी। फिर ऐसे ही 2-4 अच्छे दोस्त मिले । उन लोग भी बहुत अच्छे थे। हम सब एक साथ ही पढ़ाई करते मस्ती करते थे । एक दूसरे के एग्जाम में भी मदद करते थे। फिर सब कॉलेज आ गए। कॉलेज में सब सहेलियां अलग अलग हो गये। फिर भी कॉल से बात करते थे। पढ़ाई के कारण धीरे धीरे कॉल का आना जाना बंद हो गया। सब अपने अपने लाइफ में व्यस्त हो गए।
फिर फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से हम लोग फिर से मिल गए।और फिर से बात हमारी शुरू हो गयी।खुशी की बात यह है की आज भी मेरी बचपन की सहेलियां मेरे साथ बात करती है । हम सब फिर से एक बार मिल गये। ऐसा नही लगता कि हम सब कभी दूर भी हुये। दूर हो कर भी आज भी पास है। यही हमारी सच्ची दोस्ती की छोटी सी कहानी है।
प्रिया देवांगन "प्रियू"
पंडरिया
छत्तीसगढ़
PRIYADEWANGANPRIYU

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