गोबरधन पूजा

 




// दीपावली विशेषांक //


आलेख :

 //हमर गाँव-देहात मा गोबरधन पूजा //


           हमर छत्तीसगढ़ मा किसम-किसम के तिहार मनाये जाथे; जेमा सब ले बड़का तिहार हवै दीपावली, जेला देवारी तिहार घलो कथे। ये तिहार हर सरलग पाँच दिन तक चलथे।


धनतेरस, नरक चौदस, सुरहुती, गोवर्धन पूजा, भाईदूज। गँवई-गाँव मा चऊँथा दिन गोवर्धन पूजा दिन के बड़ विशेष महत्व होथै।


गोवर्धन के आशय :-

           गोवर्धन हर दो शब्द ले मिलके बने हे। गो अउ वर्धन; यानी गो माने पशु धन में वर्धन; पशुधन के बढ़ोतरी। गोवर्धन शब्द के अपभ्रंश आय- गोबरधन। येला राऊत मन के तिहार कहे जाथे। ये दिन बिहनिया होते साठ सब ले पहिली जेखर-जेखर घर मा गाय-गरुवा रहिथे तेन मनखे मन हर अपन-अपन गाय-गरुवा मन ला रगड़-रगड़ के नउहाथें। तुरते बाद गाय मन के पूजा-पाठ गुलाल-चंदन लगाथें।


खिचरी खवाये के महत्व :-

          घर-घर मा ये दिन खिचरी बनाये जाथे। पांँच रकम के साग- कोचई-कांदा, कुम्हड़ा, भिंडी,आलू अउ दार चाँउर मिला के खिचरी तैयार करे जाथे। बरा-सोहाँरी घलो मिलाय जाथे। भगवान श्री कृष्ण ला घलो भोग लगाथे। घर मा सियान मन हर अपन घर के गरुवा मन के पूजा-पाठ करथें अउ ओला खिचरी खवाथें। एक-एक कर के जम्मों मनखे मन खिचरी खवाथें। जेकर घर राऊत मन सोहई बाँधे बर जाय रथै , तिंखर घर मा दोहा पारत खिचरी खवाथें। 


         " अरे...ररे...रे...!

    खिचरी खाय कोदइया के,

         माखन देई अघाई।

तोर भदऊँवा झेलँव रे धँवरी,

  पारँव रे रामदोहाई।।


          अउ ताहन जम्मों मनखे मन प्रसाद के रूप मा थोरिक खाथैं। आजकल गाय-गरुवा नइ राखय त मनखे मन अपने खा लेथे, फेर खिचरी जरूर बनथे। 


आसीस देवई :-

         बिहनिया गाँव-गाँव मा रउताइन आथे। ओहर घर के तुलसी चउरा अउ माईकोठी  दे थे। चुकिया मा माहुर ला घोर के भगवान के आकार बनाथे तेला आसिस देना कहिथे। ओखर बाद राउताइन ला पसर भर धान, रुपिया-पइसा अउ कोनों-कोनों घर चाँउर घलो दे देथे। शहर मा ये सब जिनिस हर नंदागे त आज कल के लइका मन नइ जानय। घर मा आसिस के बड़ महत्व रहिथे। गाँव-गाँव म राउतइन मन के आना कमती होवत जात हे।


सोहई बंधई :-

           ये दिन राऊत मन हर घर-घर जा के गरुवा मन ला सोहई बाँधथे, अउ दोहा पारथें।

बड़ मजा आथे।


             "ऐ...अरे...ररे...रे..!

         तोला बारो महीना चरायेंव धँवरी,

          तोर संग भटकेंव खारे-खार।

              अइसे असीस दे मोर ठाकुर ला,

                जेमा तोरो होवय उद्धार।।

          राऊत मन हर पूरा अपन ग्रुप के संग गड़वा बाजा धर के आथें। अउ जोर-जोर से दोहा बोलथे अउ नाचथे। राऊत के मुखिया हर अपन लउठी जेन ला- (देवता लउठी) कहे जाथे उही मा नरियर ला एक लउठी देथे अउ नरियर फूट जाथे। अउ संगे-संग गोबर मा धान ला सान के माई कोठी मा छाबथे। तब अइसना दोहा पारे जाथै-


      "जइसे के मालिक लिये दिये,

             तइसे देयेन असीस।

               रंगमहल मा बइठो मालिक,

                  जियो लाख बीस।

               धन दोगानी भुइंयाँ पावौ,

               पावव हमर असीस,

                नाती-पूत ले तोर घर भरै,

                 जियो लाख बरीस।


राऊत मन के नाचे के बाद ओखर मन के बिदा घलो करथे अउ नवासूपा मा धान, पइसा, कपड़ा दे जाथे, जेला "सुखधना" कहे जाथे।


गोवर्धन पूजा के महत्व :-

          पौराणिक कथा मुताबिक ये दिन भगवान श्री कृष्ण हर अपन छीनी अंँगरी ले गोवर्धन पर्वत ला उठा के समस्त गोकुल वासी के रक्षा करे रिहिसे। तभे तो आज ये दिन गाय के कोठा मा घर के सियान हर गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाथे । चारों मूड़ा धान खोंचे जाथे। बीच मा करसा भर पानी रखथे। येखर ऊपर मलवा भर धान राखे जाथे। मलवा मा दीया जलाये जाथे। कोठा के आगू मा नान-नान सिलियारी, मेमरी अउ तुलसा घलो खोंचथे। राऊत मन हर दोहा पारत रहिथे अउ सियान मन हर पूजा -पाठ करथें। संंझाकुन गाँव भर सकलाके साँहड़ा ऊपर मा गोवर्धन पूजा करथें अउ एकठिन नान्हें धँवरी बछिया ले गोवर्धन खुँदवाथें। इही बेरा के दोहा होथै।

              "पूजा करै पुजेरी संगी,

                    धोवा चाउँर चढ़ाई।

          पूजा होवत हे मोर गोवर्धन के,

                   सेत धजा फहराई।।"


               आज कल गाँव मन मा गाय पालना कमती होगे हे । त राऊत मन अब नइ दिखे। जम्मो झन खाय-कमाये ला चल देथे। गाँव  मा ये रीति-रिवाज हर नंदावत जात हे। हमर आने वाला पीढ़ी  मन हर कुछू नइ जानही, तइसे लागथे। हमन ला जरूरत हे कि ये तिहार के नियम ला बनाये रखना हे अउ आने वाला पीढ़ी ला येखर महत्व के बारे मा समझाना हे।

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                "जय जोहार"


रचनाकार

प्रिया देवांगन "प्रियू"

राजिम

जिला - गरियाबंद

छत्तीसगढ़

PRIYA DEWANGAN "PRIYU"

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