व्यंग्य

 





व्यंग्य :


        // सोंचथँव कि का होही साहित्य के //


          "राम–राम गा संगवारी। कइसे मालिक अतेक का लिखाय हे आज के गजट मा ? मुँह ले बक्का घलो नइ फूटत हे।" रामभरोस हा चौरा मा बइठे घनश्याम ले पूछीस।

          "राम–राम गा भैया राम राम। हमर छत्तीसगढ़ के हाल ला पढ़त हँव ता मोला रोवासी घलो आवत हे।" एक पन्ना अउ पलटिस।

          "का होगे संगवारी, का लिखाय हे तेमा तोला रोवासी आवत हे ?" रामभरोस हा घनश्याम ल पूछत चौरा मा बइठ गे।

 ‌ "ता सुन। घनश्याम ह बोलिस- "आज कल हमर छत्तीसगढ़ के हर गली-मोहल्ला मा कवि मन के भरमार होगे हे गा।"

          "हव सही कहे जी संगवारी।" रामभरोस हा हुकारू देवत रिहिस- "दू–चार लाइन ला लिख देथे अउ तुक्का मिला देथे ता जगह –जगह गोहार पारत फिरथे, मैं कवि आव...मैं कवि आव.... कहिके। अपन नाँव के आगू मा कवि लिखना चालू कर देथे। बपुरा मन ला न कोनो व्याकरण के ज्ञान रहय, न कोनो मात्रा के। व्याकरण तो व्याकरण मात्रा अउ छत्तीसगढ़ी शब्द के हाल ला बिगाड़ के रख देहे। तभे तो हमर छत्तीसगढ़ पिछड़त जात हे। अब देख न तही हा रामभरोस भैया। परियावरन, दुरुग, भेलाई, रइपुर, रोटि–पिठा, , सीरी राम जी का आरती। अइसने अब्बड़ अकन रचना मन ला पढ़े अउ‌ देखे ला मिलथे। संपादक मन घलो जस के तस कापी–पेस्ट कर देथे। फेर कवि मन ला का पूछना, आगास मा उड़े ला धर लेथें, फलाना जगह मोर रचना छपे हे कहिके। अउ तो अउ बड़े–बड़े मंच मा जाके, कवि सम्मेलन करके सम्मान पा जाथे। अधजल गगरी छलकत जाय। बोले बर सीख गे ता कवि बन गे। अउ उही ला कोनो लेखन के परीक्षा होही, ता सौ झन मा बीस झन भर पास हाेही तइसे लगथे। सिरिफ माइक ला धरके सम्मान पवई हर कोनो ल कवि नइ बनाय। दूसर के नाम ला तो बिगाड़ के लिखत हे। परभा , सरसती, जागेसर। अपन नाम ला काबर बने लिखथे, "जागेसर वरमा" लिखना चाही। जगह–जगह तो इही मन सम्मान ला बटोरत रहिथे। आजकल तो गुगल मिट मा‌ ऑनलाइन प्रशस्ति पत्र मिलत हे। बड़े–बड़े साहित्यकार, जेन मन व्याकरण के डोर ला कस के पकड़ राखे हे, तेन मन तो बोटोर–बोटोर इँखरे मन के मुँह ला देखत रहिथें। सोसल मीडिया के जमाना हे। लमा–लमा के लिख देथे, फलाना जगह के कवि सम्मेलन मा सम्मान प्राप्त । देखइया मन हर तको कमती नइ रहें। ठेंगा ला देखा दे थे, ता पोस्ट करइया खुश हो जथे बने पसंद करे हे मोर फोटू ला। अब ठेंगा दिखइया जानही के लाइक करे हे या ठेंगा दिखा हे तेला।

          "पुस्तक छपवाए मा कमी नइ करय। फेर आजकल तो सुने मा आथे जी घनश्याम।" रामभरोस बोलते रिहिस- कवि सम्मेलन म घलो अपनेच आदमी अउ संगवारी मन ला बलाथें। 

         "अरे का बताँव रामभरोस भैया। पइसा फेंक, तमाशा देख, के जमाना हे गा। तैं कवि सम्मेलन करवाबे त मोला बलाबे अउ मँय कवि सम्मेलन कराहूँ त तोला बलाहूँ। अउ धोखा ले तोला नइ बलायेंव ता तोर–मोर दोस्ती खतम ।घुघुवा ले जादा बड़े मुहूँ फूल जाथे। बिचारा घुघुवा फोकट बदनाम हे मुहूँ फुलई मा। हमर पुरखा साहित्यकार मन सरग ले देखत होही ता गारी घलो देवत होही। साहित्य ला खेल–तमाशा बना डरे हे भुइंयाँ मा तो। 

           गोठियात-गोठियात बेरा अगास मा चढ़गे। अउ कलेचुप रामभरोस अपन घर कोती रेंग दिस। घनश्याम ह गजट ला घरी करके तरी मा मढ़ा दिस। मुड़ धर के बइठगे- "हे राम ! हमर साहित्य के का हाल होवत हे ?अब हमर का होही परमात्मा ?

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//लेखिका//

प्रिया देवांगन "प्रियू"

राजिम

जिला - गरियाबंद

छत्तीसगढ़

PRIYA DEWANGAN "PRIYU"



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