चटनी के चटकारा

 



//चटनी के चटकारा//


मोर संग म रहिबे ता खाबे नून चटनी.... तोर संग रहूँ ता खाहूँ नून चटनी.... जइसे गीत ल गावत खानी हमर मुँह म पानी आ जथे, काबर कि हमर छत्तीसगढ़ के चटनी के स्वाद हर बड़ गजब के होथे। हमर चटनी बनाय बर कोनो महीना, मउसम अउ बेरा नइ लगै। जब मन लागिस तब बना ले अउ चटकारा मार के खा ले। मोला चटनी के गोठ गोठियात-गोठियात सुरता आवत हे, हमर छत्तीसगढ़ म कतको किसम–किसम के चटनी बनाए जाथे, अउ चटनी बनाना तइहा जमाना के रीति–रिवाज घलो हरै। त आवव संगी –जहुँरियामन, चटनी के चटकारा लेबो।


सील लोड़हा के पीसे चटनी असन स्वाद, आजकल के मिक्सी म नइ रहय, पहिली के मनखे मन पताल चटनी ल बड़ आनंद ले के खावय।

पताल, हरियर धनिया, लसुन के करी, हरियर मिरचा अउ नून डार के सील–लोड़हा म घसर के चटनी बनावॅंय, अभी घलो कतको घर म अइसनेच पीसे वाला चटनी बनथे।

ये पताल के चटनी ल खाए के मजा अलग ही रहिथे। "अंगाकर रोटी, बासी, भात फरा अउ चीला संग खाय म मजा आ जाथे।"


"ये चटनी मन पहिली के जमाना ले छत्तीसगढ़िया मनखे के अंतस म राज करत हें। साग नइ रहै त नून अउ मिरचा ल सान के खा लेवँय"


बंगाला चटनी, चिरपोटी पताल के चटनी, लसुन–मिरचा के चटनी, कच्चा आमा के चटनी, पदीना चटनी, करौंदा चटनी, अमारी भाजी फूल के चटनी ल भुरका चटनी कहे जाथे। 

गर्मी दिन मा बरफ के गोला (चुसकी) ल देखतखानी लइका मन के मुँह म पानी आ जाथे, अइसने कच्चा आमा के चटनी ल सिरिफ सुरता करते साठ मनखे के लार चुचवा जाथे। आही काबर नहीं....आखिर आमा फल के राजा हरे! 

कच्चा आमा ल छील के, ओमा नून, कच्चा मिरचा, लसुन , हरियर धनिया डार के सील–लोड़हा मा पीस दव। येखर सवाद अउ सुगंध मन ल मोह लेथे। ओखर बाद चटकारा बजा –बजा के खाए म आनंद आ जाथे। पेट के सबो आगी बुता जाथे। दिमाग जूड़ अउ शांत हो जाथे। ये हरय कच्चा आमा चटनी के कमाल।


सबो चटनी ल तो अइसने बनाए जाथे, फेर ये भुरका चटनी ल बनाए के नियम थोरिक अलग हे। ये ह अमारी भाजी के सुक्खा फूल ल पीस के, नून (सेंधा नमक), मिरचा अउ भूँजे अरसी सबो ल मिला के पीसे जाथे। 

येखर सवाद गजब के रहिथे। पेट रोग ल ठीक करथे। 


          "एक बार जेन खाये, सुरता भूले नइ भुलाये।"

            "गरमी बढ़े देह के, झटकुन दूर भगाये।।"


चटनी सिरिफ स्वाद बर बस नइ खाए जाय, येहर देह म माढ़े बीमारी ल घलो दूर करथे।

लेकिन...मिक्सी के आए ले हमर घर के सील –लोड़हा नंदावत जात हे, कोंटा मा लुका के सुसकत हावै। मनखे अपन व्यस्त जिनगी म ज्यादातर सुविधा ल देख के आलसी घलो बनत हे।

जतका ज्यादा सुविधा, ओतका आलस मनखे म आवत हे। संगेसंग असली सवाद भुलावत जात हे। 


"पताल चटनी ले पाचन क्रिया बने होथे।" करौंदा चटनी सुगर बीमारी ल दूर करथे। अइसने हर चटनी म अलग–अलग विटामिन मिलथे...।

पुरखा जमाना के चटनी खाय के रीति–रिवाज सरलग बाढ़त हे। ये बने बात हरे! हमर छत्तीसगढ़ म सगा–सोदर के मान–गउन करे बर जेवन संग म चटनी जरूर दे जाथे। चटनी के बिना जेवन दूच्छा लगथे, जइसे..... नेट बिना मोबाइल!


संगवारी हो ये चटनी के रीति–रिवाज ल बनाए रखौ अउ जिनगी म चटकारा लेवत रहौ।



//लेखिका//

प्रिया देवांगन "प्रियू"

राजिम

PRIYA DEWANGAN "PRIYU"



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