फर्स्ट प्राइज
बाल कहानी :
// फर्स्ट प्राइज़ //
इस बार स्कूल में बहुत मजा आने वाला है। आएगा भी क्यों नहीं; बालमेले का आयोजन जो हो रहा है। यह एक प्रतियोगिता भी है। राहुल और संयम को पिछली बार का आयोजन याद आने लगा। बड़ा मजा आया था उन्हें।
संयम बोला– "हाँ, यार राहुल उस बार हमने मोमोज़ और तीखी चटनी बनाई थी। सर–मैम ने बहुत तारीफ़ की थी। इस बार भी हमारे ग्रुप को ही फर्स्ट प्राइज़ मिलना चाहिए। सो फ्रैंड्स! सभी तैयार हो जाओ। बातें करते–करते सभी बच्चे अपने–अपने घर लौट गये।
दूसरे दिन बच्चे मेले की तैयारी में लग गये। स्कूल कैम्पस सज गया। बच्चों की किलकारियाँ गूँजने लगी। पकवानों की खुशबू फैलने लगी थी। टीचर भी बहुत खुश थे। लेकिन संयम, जो पकवान बना रहा था, उसे देख सभी बच्चे हँसने लगे।
"अरे! संयम ये क्या बना रहा है तू, इसे कौन खाता है भला?" उसके क्लासमेट्स चिढ़ाते हुए बोले। संयम शांत दिमाग से अपने काम में व्यस्त रहा। थोड़ी देर बाद संयम के पकवान की खुशबू के सामने सभी पकवानों की खुशबू फीकी पड़ने लगी। बाहर से आए अतिथिगण मुस्कुराते हुए पूछने लगे– "संयम बेटा ये क्या बनाया है तुमने? हमने तो पहले इसे कभी नहीं खाया है।"
संयम ने बड़ी ही शालीनता से जवाब दिया- "सर, ये हमारे गाँव का बहुत ही उत्तम पकवान है। इसे हम "अंगाकर रोटी" के नाम से जानते हैं। हमारे गाँव में पिज्जा, बर्गर, मैगी ये सब इसके सामने बिल्कुल फीके लगते हैं। गाँव के लोग इसे खा कर अपने काम पर जाते हैं। इसे खाने से शरीर के कई तरह के रोग भी दूर होते हैं। इससे शरीर स्वस्थ रहता है।"
राहुल और संयम की बातें सुन सबको हैरानी हुई। वे रोटी को निहारने लगे। फिर अंगाकर रोटी और धनिया डली टमाटर-मिर्ची की तीखी चटनी का चटकारा लेते हुए अंग्रेजी मीडियम स्कूल के प्रिंसिपल संयम की पीठ थपथपाते हुए कहने लगे- "आज हमें बहुत ही गर्व हो रहा है कि संयम जैसे बच्चों ने हमारे स्कूल में पढ़ कर गाँव की संस्कृति को जीवित रखा है। हमें अपनी संस्कृति व खान–पान पर गर्व करना चाहिए। शर्म महसूस बिल्कुल नहीं करनी चाहिए।"
संयम को प्रथम विजेता घोषित करते हुए प्रिंसिपल के साथ उसके माता–पिता का सर गर्व से ऊँचा हो गया।
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//लेखिका//
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़
PRIYA DEWANGAN "PRIYU"

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