महतारी भाखा
कहानी :
// महतारी भाखा //
"कोन गाँव जावत हस काकी? ए दुलारी काकी...! तैं मोला नइ चिन्हत हस का ओ...?" आशा ह बस म बइठे गाँव के एक झिन माई लोगिन ल हुद करइस।
"अई... तोर अवाज ह तो आशा सरिक लागत हे ओ नोनी।" दुलारी हर आशा डहर मुँहू करिस।
"हव...हव... आशा हरँव ओ।" "कइसे मुँहू–कान ल चमचम ले बाँध ले हस दई? आँखी भर जुगुर–जुगुर चिमनी कस बरत हे।" दुलारी ह गोठियात-गोठियात हाँस डारिस।
"का करबे काकी, अब्बड़ धुर्रा–फुदकी के मारे मुँहू–कान हर कइसे हो जाथे। तहूॅं बाँध ले कर न काकी।" आशा बने समझाए अस बोलिस। तभेच "अइ देखत हस येला। नानपन म धुर्रा म घोलँड–घोलँड के खेले हे तेला, भुलागे बाई जी ह।" तीर म बइठे दूसर माई लोगिन ल अँखियात दुलारी ह बोलिस।
"टार वो काकी, तोला समझई बेकार हे।" आशा ह खिड़की कोती मुँहू कर लिस।
"आशा ये आशा.... अइ रिसा गेस का बेटी? मैं तो अइसने ठट्ठा करत रहेंव ओ। तैं कहाँ जावत हस बेटी बता?" दुलारी काकी ह आशा ल पूछिस।
"मैं ह बालोद जावत हँव काकी; अउ तैं हा? अइ महूँ उहें काम हे ते पाय के जावत हँव।"
थोरिक देर बाद कॉलेज पढ़इया चार–पाँच झन नोनी मन बस म चढ़ीन। कंडेक्टर ल बोलिस – "भैया, हम लोगों को कॉलेज के पास उतार देना।" दुलारी काकी के बगल वाला सीट खाली रिहिस, तेन म एक झन नोनी ह बइठिस। दुलारी अउ आशा आगू–पीछू वाले सीट म बइठे रहँय।
"समारू बबा घर के बहू के किस्सा नइ सुनई आवत हे या आशा बनेच दिन होगे।" दुलारी बोलिस।
"हव काकी! जब ले मोर आंगनबाड़ी म नौकरी लगे हे तब ले काखरो घर के बारे म ध्यान नइ देवत हँव।" आशा बोलिस।
"अइ तोर नौकरी लग गे या….! बने झऊँहा–झऊँहा बधई हो बेटी। दूधो नहाओ पूतो फलो।" दुलारी ह मुस्कावत आशा ल हिरदय के भितरी ले आशीष देवत बोलिस।”
"काला दूधो नहाबे काकी? चाहा बर नोहर होगे हे ते।" आशा बोलिस- "काकी सुन न ओ....।"
"काय बेटी।" दुलारी बोलिस।
"तहूॅं ह चारी चुगली म ध्यान मत दे कर काकी। बने राम भजन ल करे कर। जिनगी के का ठिकाना, आज नीचे कल ऊपर जाना।"
"बने बोलत हस बेटी। अब मोरो मन ह राम भजन म रहिथे। लोटा भर जल ल भोलेनाथ म चघा देथों। जादा एती–तेती नइ जाँव। मोरो कनिहा ह ढील होगे हे न, सियान समरत मनखे।" दुलारी ल थोरिक हाँसी आगे।
अइसे–वइसे........ हाथ ल लमा–लमा के दूनों झन दुलारी अउ आशा गोठियात रिहिन। बस म बइठे मनखे मन, कोनों सुन के मजा लेवत राहय, कोनों कंझावत राहय।
तभेच, "ओहो.......! कब आएगा ये कॉलेज? तंग आ गई हूँ मैं इन देहाती–गँवार लोगों की बातें सुन–सुन कर। जब से बस में बैठी हूँ। इनका मुँह बंद ही नहीं हो रहा है। पता नहीं जिमी कांदा खाके आए हैं, लग रहा है।" मुँहू बनावत एक झन नोनी तमतमा गे।
"अई तैं कोन होथस नोनी हमन ल चुप करइया? गोठियाबोन नहीं का, बिक्कट दिन बाद मिले हन त? नइ सुनना हे बात ल, कान ल तोप ले।" अपन जगा ले उठत दुलारी जोरदरहा आवाज म बोलिस।
नोनी किहिस – "नॉनसेंस!"
दुलारी आग बबूला होगे अंग्रेजी ल सुन के। ये नोनी तैं चुप रहा, समझे। कोन ल सेंस नइ हे बोलत हस। हमन ह देहाती हरन? हाँ! हम हरन देहाती, काबर कि हम छत्तीसगढ़िया हरन।" आशा घलो दुलारी काकी के साथ दे लगिस।
आशा बोलिस- "काकर पास सेंस नइ हे? हमन ह छत्तीसगढ़ी बोलत हन त, का तोर अंग्रेजी भाखा ल नइ समझबो? हाथ ल लमा–लमा के बोले ल लग गे।
"मैं ह अपन जमाना के पाँचवीं पास हँव नोनी।" दुलारी बोलिस- "कम झन समझ तैं मोला। तैं विदेश म जनमे हस का, बता?" सब के सब तमाशा देखे ल लग गे। एक झन टूरी ह अपन सहेली ल चुप करावत बोलिस- "अरे यार तू शांत हो जा। इन डोकरी लोगों के मुँह लगना बेकार है।" फेर कहाँ चुप होही वो टूरी ह। झगरहीन बानी के दिखत रिहिस तेन ह। "आजकल के लोग-लइका मन एक कनी अंग्रेजी स्कूल म पढ़ लेथे त अपन आप ल अंग्रेज के रिश्तेदार समझे ल लगथे। अपन बोली भाखा ल बोले म लजाथें।" दुलारी बोलिस।
"हव... हव... हम लोगों को आपकी ये देहाती भाषा बिल्कुल भी पसंद नहीं है।" अँगरी देखावत फट ले जम्मों टूरी मन हुँकारू दे लगिन। धीरे–धीरे बात बनेच बढ़गे अउ बढ़ही काबर नहीं; आखिर अपन छत्तीसगढ़ महतारी के मान–सम्मान के बात हरै।
थोरिक देर बाद आशा बड़ प्रेम ले समझा के बोलिस– "देखव बेटी हो......न हमन तुमन ल जानत हन, न तुमन हमन ल। फेर मोर काकी ह गुस्सा वोला देहाती बोले हव, अनपढ़ बोले हव ओखर कारन नइ होइस। तुमन ह जेन धरती म रहत हो, पढ़त–लिखत हो, अरे! तुमन जेकर कोरा म खेलत हो ओखरे अपमान करत हो। आज के युवा पीढ़ी अभी ले अइसे करही त कइसे हमर छत्तीसगढ़ ह आगू बढ़ही? तुमन नइ बोलना चाहत हो त झन बोलव; फेर अपन महतारी भाखा के अपमान तो झन करव। सुनव बेटी हो हम सब ल गर्व होना चाही कि हमन छत्तीसगढ़िया हरन। छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा म पलत, बढ़त हन। छत्तीसगढ़ हमर सब ले पहली महतारी हरय जेन ह अपन कोरा म जगा दे हे। सबले बड़का बात, तुमन जेन कॉलेज म जाथव अलग–अलग राज के मन घलो पढ़े बर आवत होहीं। का ओमन ह छुट्टी होय के बाद अपन भाखा ल नइ बोलैं? का फोन म अपन महतारी–बाप संग अपन भाखा नइ बोलैं? बेटी हो.... हमन कतका किस्मत वाले हन जेन अपन राज ल महतारी बोलथन।"
"दूसर राज ल दूसर देश ल महतारी, बाबू या कका बोलत सुने हव, हे कोनों जवाब? अमेरिका ल तुमन अमेरिका पिता है, बोलत सुने हव, बतावव?" बोलत खानी दुलारी के आँखी ह डबडबा गे। अँचरा म ऑंसू पोंछत चुप होगे।
बस के जम्मों यात्री मन ये शब्द ल सुन के दुलारी अउ आशा बर ताली बजाए लगिन। एक झन दंपत्ति बस म बइठे–बइठे गोठ बात ल सुनत रिहिन तेन म के आदमी बोलिस। वाह काकी! सभी उदाहरण सुना था; फेर अइसन अपन महतारी भाखा बर पहली बार सुन रहा हूँ। मैं आप मन ल बताना चाहता हूँ कि हमन ल छत्तीसगढ़ी बोलने नहीं आता है, हम लोग गुजरात से छत्तीसगढ़ भ्रमण के लिए आए हवन। फेर थोड़ा–थोड़ा समझ में जरूर आता है। बिटिया हो, तुमन ल काकी की बातों का बुरा न मानते हुए इनकी बातों को जीवन म उतारना चाही।" बेचारा गुजराती दंपत्ति टूटे–फूटे भाखा म छत्तीसगढ़ी के कुछ वाक्य बोले के प्रयास करत रिहिन। ये सुन के लइका मन अकबका गे। जइसे सबो झन ल साँप सूॅंघ गे। गुजराती सियान–सियानीन मन खड़े हो के छत्तीसगढ़ महतारी के जयगान करे लगगें।
ओखर संगे–संग बस म बइठे मनखे मन घलो महतारी भाखा के जय बोले लगिन। आज कल लइका मन जेन, अपन भाखा बोले बर लजाथें, ओमन ल बने सबक मिल गे।
बस ड्राइवर हर, "पों....पों.... बजावत बोलिस कॉलेज आगे, चलो–चलो।" नोनी मन आशा अउ दुलारी ले माफी माॅंगत पाँव पर के बस ले उतर गिन।
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//लेखिका//
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़
PRIYA DEWANGAN "PRIYU"

अब्बड़ सुग्घर
ReplyDeleteबढ़ सुग्घर कहनी....जय हो नोनी तोर।
ReplyDeleteदेर सही फेर जागिस तो सही। बढ़िया कहानी प्रिया बधाई 🌹🌹🌹
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