आस्था

 




‎           //आस्था//


‎आज मंदिर में बहुत भीड़ थी। रहेगी ही.... नवरात्रि की पंचमी तिथि जो थी। पाँव रखने की जगह नहीं। जितनी भीड़ मंदिर के भीतर उतनी ही भीड़ मंदिर के बाहर...।

फर्क इतना था कि मंदिर के अंदर वाले भक्त कहलाते और बाहर वाले भिखारी।

मंदिर के भीतर वाले सीधे भगवान जी से जुड़ने की कोशिश में थे और बाहर वाले इंसानों से।


‎एक बूढ़ी माँ काफी देर से लाइन में लगी हुई थी। पुजारी को बार–बार बोलती रही- "बेटा...मुझे जल्दी दर्शन करवा दो, मैं बूढ़ी औरत कब तक खड़ी रहूँगी।" पुजारी जी भड़क उठे......बोला न! बाद में आना, पूरा अशुद्ध कर दी मंदिर को। यहाँ तुम जैसे लोगों के लिए जगह नहीं है। जा अपनी जगह पर बैठ जा; जो कि सीढ़ियों के नीचे है। नहीं जाऊँगी, जब तक माता जी का दर्शन नहीं करूँगी। बूढ़ी भिखारन अपनी जिद्द पर अड़ी रही। तभी पीछे से शहर का बहुत रईस व्यापारी आया जो कि हर साल लाखों रुपए दान मंदिर में चढ़ाता है। उसे आते देख पुजारी का गुस्सा फ्रिज के ठंडे पानी की तरह एकदम शांत हो गया। होगा भी क्यों नहीं...... हर बार की तरह इस बार भी पुजारी जी की इच्छा थी कि कम से कम पचास हजार तो पक्के हैं, नवरात्रि जो चल रही।


‎आते ही वह व्यापारी से बोला– "सर! आपको जल्दी माता रानी के दर्शन करवा देंगे बस...एक टिकट ले लीजिए, आपके लिए तो फ्री में टिकट है, बोलो तो बुक कर देता हूँ।" व्यापारी हमेशा जल्दी में ही रहते; सो.... उन्होंने हाँ बोल दी और आगे की तरफ बढ़ गए।


‎बूढ़ी माँ सुनते ही बोलने लगी- "वाह!! हम सारे मूर्ख हैं क्या? जो लाइन में लगे हैं; बता तेरा टिकट कहाँ हैं? मैं भी उसी में दर्शन करूँगी।" पुजारी, बूढ़ी औरत को घूरते हुए बोला– "ये तुम जैसे लोगों के लिए नहीं है। बड़े–बड़े व्यापारी लोगों के लिए है।" इतना कह कर जबरदस्ती उसे अन्य भिखारियों के साथ बिठा दिया। व्यापारी, पुजारी की हरकतों से भली–भांति परिचित था। माता रानी के दर्शन में भी भेदभाव! व्यापारी ने टिकट कटाया और अंदर दर्शन कर बाहर निकला जैसे मंदिर उन्हीं का है और माता रानी उन्हीं का इंतजार कर रही हो। व्यापारी को प्रसाद के रूप में मिठाई का बड़ा डिब्बा, फल–फूल दिया गया; अन्य भक्त देखते रह गए। पुजारी जी के मन मस्तिष्क में लालच इंटरनेट की तरह तेजी से दौड़ने लगा कि अब पॉकेट से नोटों की गड्डियां निकलेंगी। जैसे गुड़ देखते ही मक्खी आगे पीछे भिनभिनाने लगती है वैसे ही पुजारी जी व्यापारी के इर्द–गिर्द मंडराने लगे। आज मक्खी और पुजारी में ज्यादा अंतर दिखाई नहीं दे रहा था। पुजारी जी बोल उठे– "सर आज कुछ दान दक्षिणा नहीं....!" व्यापारी जी व्यंग्य भाव से मुस्कुराए और उन्हीं के सामने ही नोटों की गड्डी, प्रसाद आदि सीढ़ियों पर बैठे भिखारियों और उस बूढ़ी माँ को बाँट दिए। व्यापारी की इस हरकत को देखकर पुजारी का चेहरा पीलिया की तरह पीला पड़ने लगा, फ्री में टिकट गया सो गया, दान-दक्षिणा भी हाथ न लगा। देखते ही देखते पुजारी के मन में व्यापारी के लिए अपशब्द निकलने लगे।



‎//लेखिका//

प्रिया देवांगन "प्रियू"

राजिम

जिला - गरियाबंद

छत्तीसगढ़

PRIYA DEWANGAN "PRIYU"






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