आसरा

 






‎                 //आसरा//


‎सपना देखत–देखत घलो कभू–कभू आँखीं म जाला परे ल लगथे। सपना देखे ले भी ज्यादा जब पूरा होथे त अंतस म उछाह बाढ़ जाथे। लीना अउ ओकर बाबू, दूनों मिल के लीना के बिहाव के सपना देखे रहे। अगास के जावत तक बाप–बेटी के नता ले तो जम्मो मनखे ह परिचित रहिथे; जब बेटी के बिहाव के पारी आथे त अउ का पूछना...!

‎समय के चक्का ह घूमत रीहिस फेर विधाता ल काय मंजूर रीहिस ते उही जानै। शायद बेटी के भाग म अपन बाप के हाथ म कन्यादान नइ लिखाए रीहिस।

‎'समय के चक्का ह तो घूमते रहिथे, ये हर नदिया के पानी जइसे होथे, कतको रोके के उदिम कर ले; समुंदर म समाय बर रद्दा खोज डारथे।' बेरा आइस; बेटी के बिहाव बने सरकारी नौकरी वाला लड़का संग तय होगे। घर वाले मन खुशी–खुशी लेन–देन के तैयारी करे ल लागिस।

‎‌‌कन्यादान के बात ल ले के खुसुर–फुसुर होवत रहै परिवार म। अब नोनी के कन्यादान ल कोन करही? एक झन रिश्तेदार ह पूछे के हिम्मत जुटा डारिस। जतेक करीबी रिश्तेदार रहिन, एक–एक पाँव पाछू घुॅंचगें।

‎काबर.... आजकल महंगाई के जमाना हे, कन्यादान ल कर देबो त हमन ल हर बछर तीजा म लाए-लेगे ल परही। एकर बोझा हमन ह अपन मुड़ी म नइ लादन।

‎झरझर झरझर झरना कस आँसू बोहाय लग गए लीना के महतारी के। हे विधाता! काय करम करे हन, एक झन बेटी के कन्यादान के पुरतन नइ होएन। अपन जोड़ी ल सुरता करत टोटा फार के रोए ल लगीस अउ हाथ जोर के सब ले विनती करिस कि मत लेहू कोनो मोर बेटी के ठेका; मोर बेटी बोझा नइ हे, मँय पूछ ले करहूॅं अपन बेटी ल, फेर कन्यादान ल तो कर दौ, एकर बिना सब अधूरा हे। कोनो 'मनखे के कान म जूँ नइ रेंगिस।'

‎माथा धर के बइठगे लीना के दाई ह। भगवान ल सोरियाय लागिस। सब के बनौती ल लीना के बाबू अउ मँय दूनो परानी मिल के बनाए हन आज हमर कोनो नइ हे।

‎ठउका; "एक झन दंपति मन देवता सरिक आइस, अउ बोलिस आप मन चिंता झन करौ भऊजी, मोर कोनो लइका नइ हे, का हमन नोनी के कन्यादान कर सकत हन?

‎लीना के महतारी ह आँखीं खोलिस। तुमन ल चिन्हे–चिन्हे लागत हे भैया, कोन हरौ ते? दंपति ह बताइस कि लीना के बाबू के नानपन के दोस्त "हरि" हरौं।

‎ओहोहो....माफ कर दे भैया, चिन्हारी नइ आत हौ; गजब दिन बाद भेंट करे हव।

‎तैं चिंता झन कर बेटी लीना, हमन जीयत भर ले तोला पूछबो। तुमन ला भगवान ह भेजे हे भैया, जेकर कोनो नइ हे तेकर भगवान हे। 'छाती म लदकाए पथरा ह उतर गे अउ लीना के महतारी ह हरि के चरण म घोलन गे।'

‎ये सब किस्सा ल देख-सुन के रिश्तेदार के पाँव तरी धरती खिसक गए। बोकबाय मुँह ल देखत रहिगे सब झन। लीना ल एक अउ माँ–बाप मिलगे। फागुन तिहार के बाद बिहाव माढ़िस; सबो रिश्तेदार मन समहर-ओढ़ के पहुॅंचे लागिन। उही बेरा लीना के महतारी ह छाती ठोक के जम्मो रिश्तेदार ल बोलिस कि तुम्हर कोनो जरूरत नइ हे; तुमन तो सब " बाँटे भाई परोसी" होगे हव। अब आए हव ता खा–पी के जाहू। फेर अइसन परिवार-रिश्तेदार के बोझा रखे ले काय मिलही जेन एक बेटी ल खुदे बोझा समझथें, जतका रिश्ता-नता मन रिहिन सरम के मारे मुड़ी नवा के अपन–अपन रद्दा रेंगे लागिन।

‎//रचनाकार//

‎प्रिया देवांगन "प्रियू"

‎राजिम

‎जिला - गरियाबंद

‎छत्तीसगढ़

‎PRIYA DEWANGAN "PRIYU"





Comments

  1. आज के रिश्तेदार अउ परिवार मन के सोच ल परगट करत बहुत मार्मिक रचना। बहुत बहुत बधाई प्रिया 🌹🌹🌹🙏🙏🙏

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