मिठास
(मकर संक्रांति विशेष)
//मिठास//
कृति को यू ट्यूब देख ऐसा लग रहा था मानो बाएं हाथ का खेल हो लेकिन....... किसी काम को सोचने और करने में जमीन–आसमान का फर्क तो होता ही है।
यू ट्यूब ऑन कर, गैस प्लेटफॉर्म में मोबाइल रख स्क्रीन एक ऊंगली से सरकाई जा रही थी, उसे समझ नहीं आ रहा था आखिर ये तीन तार की चाशनी बनती कैसे है?
उसे लगता था कि यू ट्यूब ही उसे हर कार्य में माहिर बना देगा। इसलिए कभी किसी की मदद नहीं लेती थी।
लेकिन......वीडियो देख–देख उसका सिर घूमने लगा।
कहते हैं न "मरता क्या न करता"। आखिरकार कृति को सासू माँ के पास जाना ही पड़ा।
कृति सासू माँ के पास गई, बातों से मक्खन लगाती हुई मन की सारी बात बताई; सासू माँ कृति के पैंतरों से भली–भांति परिचित थी।
सासू माँ बोली– ठीक है! लेकिन जब तक बनेगी नहीं तुम यहाँ से हिलना नहीं; मेरी मदद करना। कृति के होठों पर मुस्कान आई।
सासू माॅं झटपट से चाशनी और लड्डू तैयार कर ली। कृति अपनी आँखें बड़ी कर निहारने लगी और बोली- "अरे वाह! माँ जी आपने इतनी जल्दी लड्डू तैयार कर लिए।" हाँ....एक बार किसी काम को मन से करने लगें तो कैसे तैयार नहीं होगी। हमारी तो आदत है न हर चीजें समेट कर रखने की...। कृति बोली– "मैं कुछ समझी नहीं।"
सासू माँ बोली– "बेटा! रिश्ते भी इस तिल के लड्डू की तरह होते हैं, पाग अच्छी रहेगी तभी लड्डू को बाँध कर रखेगी। नहीं तो कभी कठोर, बिखरी, कभी जरूरत से ज्यादा मुलायम, हाथ लगाते ही टूट जाती हैं; और कभी बनती ही नहीं। रिश्तों में अगर स्नेह की चाशनी अच्छी रही तो जीवन भर लड्डू जैसे बँधी रहेगी। नहीं तो वही हाल होगा जो तुम अपने हाथों से बना रही थी तब हुआ।
और एक बात याद रखना...... हर बार दूसरों के बताए हुए रास्ते पर चलोगी तो कभी आगे नहीं बढ़ पाओगी। जैसे तुम यू ट्यूब से लड्डू बनाना सीख रही, पूरा दिन बिता दी फिर भी नहीं बनी। बुजु़र्गों के पास बैठने से जो शिक्षा और संस्कार मिलते हैं वो आज के यू ट्यूब चैनल वालों से नहीं;...समझी!
सासू माँ आज तिल के लड्डू के साथ–साथ कृति को जीवन का एक ऐसा पाठ सिखा रही थी जो कृति के अंतर्मन को छू गई।
कृति को अपनी गलती का एहसास हुआ और रिश्तों की मिठास कृति के दिल–ओ– दिमाग में धीरे–धीरे घुलने लगी।
//रचनाकार//
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़
PRIYA DEWANGAN "PRIYU"

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